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काली-शाबर-मन्त्र

काली-शाबर-मन्त्र
सम्मानीय पाठकों,
शाबर-मन्त्र के एक पाठक “श्री काली चरण कम्बोज” जो अब इस साइट के सहयोगी भी हैं, का हृदय से आभार व्यक्त करता हूँ, ने शाबर-मन्त्र के लिये “काली-शाबर-मन्त्र” भेजा है जो इस प्रकार है-
Kali Kali Maha kali, Inder ki beti Brahma ki sali
Piti bhar bhar rakt payali, ud baithi pipal ki dali
Dono hath bajai tali, Jahan jai vajra ki tali,
Vahan na aye dushman hali,
Duhai kamro kamakhya naina yogni ki,
Ishwar mahadev gora parvti ki,
Duhai veer masan ki.

40 din 108 bar roj jap kar sidh kare, paryog ke time padh kar teen bar jor se tali bajaye, jahan tak tali
ki awaj jayegi, dushman ka koi var ya bhoot pret asar nahi karega.
“काली काली महा-काली, इन्द्र की बेटी, ब्रह्मा की साली। पीती भर भर रक्त प्याली, उड़ बैठी पीपल की डाली। दोनों हाथ बजाए ताली। जहाँ जाए वज्र की ताली, वहाँ ना आए दुश्मन हाली। दुहाई कामरो कामाख्या नैना योगिनी की, ईश्वर महादेव गोरा पार्वती की, दुहाई वीर मसान की।।”
विधिः- प्रतिदिन १०८ बार ४० दिन तक जप कर सिद्ध करे। प्रयोग के समय पढ़कर तीन बार जोर से ताली बजाए। जहाँ तक ताली की आवाज जायेगी, दुश्मन का कोई वार या भूत, प्रेत असर नहीं करेगा।
श्री काली चरण कम्बोज की ई-मेल आई-डी हैः-kambojkc70@yahoo.co.in
श्री कम्बोज का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन तथा आभार। आपसे अनुरोध है इसी प्रकार स्नेह बनाए रखें।

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दुर्गा शाबर मन्त्र

दुर्गा शाबर मन्त्र

“ॐ ह्रीं श्रीं चामुण्डा सिंह वाहिनीं बीस हस्ती भगवती, रत्न मण्डित सोनन की माल। उत्तर पथ में आन बैठी, हाथ सिद्ध वाचा ऋद्धि-सिद्धि। धन-धान्य देहि देहि, कुरू कुरू स्वाहा।”

उक्त मन्त्र का सवा लाख जप कर सिद्ध कर लें। फिर आवश्यकतानुसार श्रद्धा से एक माला जप करने से सभी कार्य सिद्ध होते हैं। लक्ष्मी प्राप्त होती है। नौकरी में उन्नति और व्यवसाय में वृद्धि होती है।

कार्य-सिद्धि हेतु गणेश शाबर मन्त्र

कार्य-सिद्धि हेतु गणेश शाबर मन्त्र
“ॐ गनपत वीर, भूखे मसान, जो फल माँगूँ, सो फल आन। गनपत देखे, गनपत के छत्र से बादशाह डरे। राजा के मुख से प्रजा डरे, हाथा चढ़े सिन्दूर। औलिया गौरी का पूत गनेश, गुग्गुल की धरुँ ढेरी, रिद्धि-सिद्धि गनपत धनेरी। जय गिरनार-पति। ॐ नमो स्वाहा।”
विधि-
सामग्रीः- धूप या गुग्गुल, दीपक, घी, सिन्दूर, बेसन का लड्डू। दिनः- बुधवार, गुरुवार या शनिवार। निर्दिष्ट वारों में यदि ग्रहण, पर्व, पुष्य नक्षत्र, सर्वार्थ-सिद्धि योग हो तो उत्तम। समयः- रात्रि १० बजे। जप संख्या-१२५। अवधिः- ४० दिन।
किसी एकान्त स्थान में या देवालय में, जहाँ लोगों का आवागमन कम हो, भगवान् गणेश की षोडशोपचार से पूजा करे। घी का दीपक जलाकर, अपने सामने, एक फुट की ऊँचाई पर रखे। सिन्दूर और लड्डू के प्रसाद का भोग लगाए और प्रतिदिन १२५ बार उक्त मन्त्र का जप करें। प्रतिदिन के प्रसाद को बच्चों में बाँट दे। चालीसवें दिन सवा सेर लड्डू के प्रसाद का भोग लगाए और मन्त्र का जप समाप्त होने पर तीन बालकों को भोजन कराकर उन्हें कुछ द्रव्य-दक्षिणा में दे। सिन्दूर को एक डिब्बी में सुरक्षित रखे। एक सप्ताह तक इस सिन्दूर को न छूए। उसके बाद जब कभी कोई कार्य या समस्या आ पड़े, तो सिन्दूर को सात बार उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित कर अपने माथे पर टीका लगाए। कार्य सफल होगा।

ज्योतिष और शाबर

ज्योतिष और शाबर
साधना-काल में जन्म-लग्न-चक्र के अनुसार ग्रहों की अनुकूलता जानना आवश्यक है। साधना भी एक प्रकार का कर्म है, अतः ‘दशम भाव’ उसकी सफलता या असफलता का सूचक है। साधना की प्रकृत्ति तथा सफलता हेतु पँचम, नवम तथा दशम भाव का अवलोकन उचित रहेगा। 
१॰ नवम स्थान में शनि हो तो साधक शाबर मन्त्र में अरुचि रखता है या वह शाबर-साधना सतत नहीं करेगा। यदि वह ऐसा करेगा तो अन्त में उसको वैराग्य हो जाएगा।
२॰ नवम स्थान में बुध होने से जातक को शाबर-मन्त्र की सिद्धि में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
३॰ पँचम स्थान पर यदि मंगल की दृष्टि हो, तो जातक कुल-देवता, देवी का उपासक होता है।
४॰ पँचम स्थान पर यदि गुरु की दृष्टि हो, तो साधक को शाबर-साधना में विशेष सफलता मिलती है।
५॰ पँचम स्थान पर सूर्य की दृष्टि हो, तो साधक सूर्य या विष्णु की उपासना में सफल होता है।
६॰ यदि राहु की दृष्टि होती है, तो वह “भैरव” उपासक होता है। इस प्रकार के साधक को यदि पथ-प्रदर्शन नहीं मिलता, तो वह निम्न स्तर के देवी-देवताओं की उपासना करने लगता है।

शाबर मन्त्र का अद्भुत चमत्कार

सर्व-कार्य-सिद्धि हेतु शाबर मन्त्र
“काली घाटे काली माँ, पतित-पावनी काली माँ, जवा फूले-स्थुरी जले। सई जवा फूल में सीआ बेड़ाए। देवीर अनुर्बले। एहि होत करिवजा होइबे। ताही काली धर्मेर। बले काहार आज्ञे राठे। कालिका चण्डीर आसे।”
विधिः- उक्त मन्त्र भगवती कालिका का बँगला भाषा में शाबर मन्त्र है। इस मन्त्र को तीन बार ‘जप’ कर दाएँ हाथ पर फूँक मारे और अभीष्ट कार्य को करे। कार्य में निश्चित सफलता प्राप्त होगी। गलत कार्यों में इसका प्रयोग न करें।

शाबर मन्त्र विज्ञान

शाबर मन्त्रों का आशयः-
स्व॰ वामन शिवराम आप्टे ने सन् १९४२ ई॰ में अपने ‘संस्कृत-कोष’ में ‘शाबर’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है;
‘शब (व)-र-अण्-शाबरः, शावरः, शाबरी।’
अर्थ में ‘जंगली जाति’ या ‘पर्वतीय’ लोगों द्वारा बोली जानीवाली ‘भाषा’ बताया गया है। वह एक प्रकार का मन्त्र भी है, इसका वहँ कोई उल्लेख नहीं है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘श्रीरानचरितमानस’ (संवत् १६३१) में शाबर मन्त्रों का महत्त्व स्वीकार किया है, यह भी रहस्योद्घाटन भी किया है कि इस ‘साबर-मन्त्र-जाल’ के स्रष्टा भी शिव-पार्वती ही हैं।
कलि बिलोकि जग-हित हर गिरिजा, ‘साबर-मन्त्र-जाल’ जिन्ह सिरिजा।
अनमिल आखर अरथ न जापू, प्रगट प्रभाव महेश प्रतापू।।
आधुनिक काल में महा-महोपाध्याय स्व॰ पण्डित गोपीनाथ कविराज जी ने अपने प्रसिद्ध ‘तान्त्रिक-साहित्य’ ग्रन्थ के पृष्ठ ६२३-२४ में ‘शाबर’- सम्बन्धी पाँच पाण्डुलिपियों का उल्लेख किया हैः 
१॰ शाबर-चिन्तामणि पार्वती-पुत्र आदिनाथ विरचित, २॰ शाबर तन्त्र गोरखनाथ विरचित, ३॰ शाबर तन्त्र सर्वस्व, शाबर मन्त्र, तथा ५॰ शाबर मन्त्र चिन्तामणि।
उक्त पाँच पाण्डुलिपियों में सा प्रथम पाण्डुलिपि एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के सूचीपत्र में संख्या ६१०० से सम्बन्धित है।
द्वितीय पाण्डुलिपि की चार प्रतियों का उल्लेख कविराज जी ने किया है। पहली उक्त सोसाइटी की सूची-पत्र ६०९९ से सम्बन्धित है, दूसरी म॰म॰ हरप्रसाद शास्त्री के विवरण की सं॰ १।३५९ है। तीसरी प्रति डेकन कालेज, पूना सूचीपत्र ५८० है। चौथी प्रति की तीन पाण्डुलिपियों का उल्लेख है, जो संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के सूचीपत्र की संख्या २३८६७, २४८१५ और २४५७९ पर वर्णित है। ये तीनों अपूर्ण है।
तृतीय पाण्डुलिपि ‘शाबर-तन्त्र-सर्वस्व’ के सम्बन्ध में अपुष्ट कथन लिखा है।
चतुर्थ पाण्डुलिपि की तीन प्रतियों का उल्लेख हुआ है। पहली प्रति एशियाटिक सोसाइटी के सूचीपत्र की संख्या ६५५८ है। दूसरी प्रति बड़ौदा पुस्तकालय के अकारादि सूचीपत्र की संख्या ५६१४ पर है। तीसरी प्रति की दो पाण्डुलिपियां संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के सूचीपत्र की संख्या २३८५६ और २६२३२ से सम्बद्ध है।
पञ्चम पाण्डुलिपि एशियाटिक सोसाइटी के सूचीपत्र की संख्या ६१०० पर उल्लिखित है।
‘उ॰प्र॰ हिन्दी संस्थान’ द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दू धर्म कोश’ में सम्पादक डा‌॰ चन्द्रबली पाण्डेय ने ‘शाबर’ शब्द को अपने ‘कोश’ में स्थान तक नहीं दिया है-जबकि ‘शबर-शंकर-विलास’, ‘शबर-स्वामी’, ‘शाबर-भाष्य’ जैसे शब्दों को उन्होनें सम्मिलित किया है।
श्रीतारानाथ तर्क-वाचस्पति भट्टाचार्य द्वारा संकलित एवं चौखम्भा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी द्वारा प्रकाशित प्रख्यात ‘वृहत् संस्कृताभिधानम्’ (कोश) में भी ‘शबर’ या ‘शाबर’ शब्द का उल्लेख नहीं है।
उक्त विश्लेषण के पश्चात भी शाबर विद्या सर्वत्र भारत में अपना एक विशिष्ट अस्तित्व तथा प्रभाव रखती है। वस्तुतः देखा जाये तो समस्त विश्व में शाबर विद्या या समानार्थी विद्या प्रचलन में है। ज्ञान की संज्ञा भले ही बदल जाये मूल भावना तथा क्रिया वही रहती है।

“शाबर मन्त्र साधना” के तथ्य

“शाबर मन्त्र साधना” के तथ्य
१॰ इस साधना को किसी भी जाति, वर्ण, आयु का पुरुष या स्त्री कर सकती है।
२॰ इन मन्त्रों की साधना में गुरु की इतनी आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि इनके प्रवर्तक स्वयं सिद्ध साधक रहे हैं। इतने पर भी कोई निष्ठावान् साधक गुरु बन जाए, तो कोई आपत्ति नहीं क्योंकि किसी होनेवाले विक्षेप से वह बचा सकता है।
३॰ साधना करते समय किसी भी रंग की धुली हुई धोती पहनी जा सकती है तथा किसी भी रंग का आसन उपयोग में लिया जा सकता है।
४॰ साधना में जब तक मन्त्र-जप चले घी या मीठे तेल का दीपक प्रज्वलित रखना चाहिए। एक ही दीपक के सामने कई मन्त्रों की साधना की जा सकती है।
५॰ अगरबत्ती या धूप किसी भी प्रकार की प्रयुक्त हो सकती है, किन्तु शाबर-मन्त्र-साधना में गूगल तथा लोबान की अगरबत्ती या धूप की विशेष महत्ता मानी गई है।
६॰ जहाँ ‘दिशा’ का निर्देश न हो, वहाँ पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके साधना करनी चाहिए। मारण, उच्चाटन आदि दक्षिणाभिमुख होकर करें। मुसलमानी मन्त्रों की साधना पश्चिमाभिमुख होकर करें।
७॰ जहाँ ‘माला’ का निर्देश न हो, वहाँ कोई भी ‘माला’ प्रयोग में ला सकते हैं। ‘रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम होती है। वैष्णव देवताओं के विषय में ‘तुलसी’ की माला तथा मुसलमानी मन्त्रों में ‘हकीक’ की माला प्रयोग करें। माला संस्कार आवश्यक नहीं है। एक ही माला पर कई मन्त्रों का जप किया जा सकता है।
८॰ शाबर मन्त्रों की साधना में ग्रहण काल का अत्यधिक महत्त्व है। अपने सभी मन्त्रों से ग्रहण काल में कम से कम एक बार हवन अवश्य करना चाहिए। इससे वे जाग्रत रहते हैं।
९॰ हवन के लिये मन्त्र के अन्त में ‘स्वाहा’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती। जैसा भी मन्त्र हो, पढ़कर अन्त में आहुति दें। 
१०॰ ‘शाबर’ मन्त्रों पर पूर्ण श्रद्धा होनी आवश्यक है। अधूरा विश्वास या मन्त्रों पर अश्रद्धा होने पर फल नहीं मिलता।
११॰ साधना काल में एक समय भोजन करें और ब्रह्मचर्य-पालन करें। मन्त्र-जप करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें।
१२॰ साधना दिन या रात्रि किसी भी समय कर सकते हैं।
१३॰ ‘मन्त्र’ का जप जैसा-का-तैसा करं। उच्चारण शुद्ध रुप से होना चाहिए।
१४॰ साधना-काल में हजामत बनवा सकते हैं। अपने सभी कार्य-व्यापार या नौकरी आदि सम्पन्न कर सकते हैं।
१५॰ मन्त्र-जप घर में एकान्त कमरे में या मन्दिर में या नदी के तट- कहीं भी किया जा सकता है।
१६॰ ‘शाबर-मन्त्र’ की साधना यदि अधूरी छूट जाए या साधना में कोई कमी रह जाए, तो किसी प्रकार की हानि नहीं होती।
१७॰ शाबर मन्त्र के छः प्रकार बतलाये गये हैं- (क) सवैया, (ख) अढ़ैया, (ग) झुमरी, (घ) यमराज, (ड़) गरुड़ा, तथा (च) गोपाल शाबर।